शुक्रवार, 8 मई 2020

श्री गणपति मंगल स्तोत्र


GANPATI MANGAL STOTRA  
            गणपति  मंगल   स्तोत्र    
 मंगल करं भज गणपतिं
              मानस सदा शिवनन्दनम् !
विघ्नापदं  समकामदम् 
            ‌ निज जन्मनः परिनन्दनम् !!मं!!
गौरी प्रियं गिरिश प्रियं 
                 गणनायकं वरदायकम्  !
देवाग्रगण्यं गुणनिधिं       
‌         मुनिभिः सतत् कृत वन्दनम् !!मं!!
बुद्धि प्रदं - सिद्धि प्रदं 
                 ॠद्धि प्रदं विजय प्रदम् !
वारण वदन शुभ सदन मंगल 
                भवन गिरिजा नन्दनम् !!मं !!
ज्ञानैकगम्यं ज्ञान तनु 
                 अज्ञान नाशन पटुतरम् !
प्रणमामि तं तु दिवा निशे 
               दारिद्र दुःख विनाशनम् !! मं !!
हेरम्ब पादाम्बुज युगे 
             करूचित्र ममरति विरतरम् !
इह सफल शुभ साफल्यदम्
             प्रथमहि तव पद वन्दनम् !! मं !!
                     
                      
                      
                                 

गुरुवार, 7 मई 2020

श्री गणेशअथर्वशीर्ष sri ganesh atharvasirsh



Ganapati Atharvashirsha (Ganapati Upanishad) - In sanskrit


          स्वस्तिवाचन  
स्वस्ति  इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥     भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाग्‍ँसस्तनूभिरब्यशेमहि देवहितं यदायूः ।

 शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥   

 नमस्ते गणपतये ॥१॥
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥२॥

ऋतं वच्मि ।
सत्यं वच्मि ॥३॥
अव त्वं माम् ।
अव वक्तारम् ।
अव श्रोतारम् ।
अव दातारम् ।
अव धातारम् ।
अवानूचानमव शिष्यम् ।

अव पुरस्तात् ।
अव दक्षिणात्तात् ।
अव पश्चात्तात् ।
अवोत्तरात्तात् ।
अव चोर्ध्वात्तात् ।
अवाधरात्तात् ।
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥४॥

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः ।
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः ।
त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि ।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥५॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ।




त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ।
त्वं चत्वारि वाक् 
{परिमितापदानि ।
त्वं गुणत्रयातीतः ।
त्वं अवस्थात्रयातीतः ।
त्वं देहत्रयातीतः ।
त्वं कालत्रयातीतः ।






त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ।
त्वं शक्तित्रयात्मकः ।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं
ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥६॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादींस्तदनन्तरम् ।
अनुस्वारः परतरः ।
अर्धेन्दुलसितम् ।
तारेण ऋद्धम् ।
एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥७॥

गकारः पूर्वरूपम् ।
अकारो मध्यरूपम् ।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ।
बिन्दुरुत्तररूपम् ।
नादस्संधानम् ।
सग्ं‌हिता संधिः ॥८॥

सैषा गणेशविद्या ।
गणक ऋषिः ।
निचृद्गायत्रीच्छन्दः ।
गणपतिर्देवता ।
 गं गणपतये नमः ॥९॥

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥१०॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् ।
रदं  वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैस्सुपूजितम् ॥

भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ।
आविर्भूतं  सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ।
एवं ध्यायति यो नित्यं  योगी योगिनां वरः ॥११॥

नमो व्रातपतये ।
नमो गणपतये ।
नमः प्रमथपतये ।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय
विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः ॥१२॥

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते  ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
 सर्वविघ्नैर्न बाध्यते ।
 सर्वत्र सुखमेधते ।
 पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते ।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ।
सायं प्रातः प्रयुञ्जानो पापोऽपापो भवति ।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।
धर्मार्थकाममोक्षं  विन्दति ॥१३॥

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय  देयम् ।
यो यदि मोहाद्दास्यति  पापीयान् भवति ।
सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥१४॥

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति  वाग्मी भवति ।
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति  विद्यावान् भवति ।
इत्यथर्वणवाक्यम् ।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यान्न बिभेति कदाचनेति ॥१५॥

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति  वैश्रवणोपमो भवति ।
यो लाजैर्यजति  यशोवान् भवति ।
 मेधावान् भवति ।
यो मोदकसहस्रेण यजति  वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यस्साज्यसमिद्भिर्यजति  सर्वं लभते  सर्वं लभते ॥१६॥

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ।
सूर्यग्रहेमहानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति
महाविघ्नात् प्रमुच्यते ।
महादोषात् प्रमुच्यते ।
महाप्रत्यवायात् प्रमुच्यते ।
 सर्वविद् भवति  सर्वविद् भवति ।
 एवं वेद ।
। इत्युपनिषत् । 

                  
                                   

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः 
                   ॥ इति श्री गणपत्यथर्वशीर्षम ॥ 
                                                            

बुधवार, 6 मई 2020

'मधुराष्टकम्' MADHURASTKAM




श्रीकृष्ण की मधुर छवि के दर्शन कराती स्तुति 'मधुराष्टकम्'

वैसे तो धार्मिक ग्रंथों में श्रीकृष्ण की ढेर सारी स्तुतियां मिलती हैं, पर इन सबके बीच 'मधुराष्टकम्' की बात एकदम निराली है. इस छोटी-सी स्तुति में मुरली मनोहर की अत्यंत मनमोहक छवि तो उभरती ही है, साथ ही उनके सर्वव्यापी और संसार के पालनकर्ता होने का भी भान होता है.
'मधुराष्टकम्' के साथ आगे उसका अर्थ भी दिया गया है...
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 1 ।।
श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है. उनके होठ मधुर हैं, मुख मधुर है, 
आंखें मधुर हैं, हास्य मधुर है. हृदय मधुर है, गति भी गति मधुर है.
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम्
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 2 ।।
उनके वचन मधुर हैं, चरित्र मधुर हैं, वस्त्र मधुर हैं, अंगभंगी मधुर है.चाल मधुर है
SSS और भ्रमण भी अति मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 3 ।।
उनका वेणु मधुर है, चरण की धूल मधुर है, करकमल मधुर है, चरण मधुर है.
 नृत्य मधुर है, सख्य भी अति मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 4 ।।
उनका गान मधुर है, पान मधुर है, भोजन मधुर है, शयन मधुर है
. रूप मधुर है, तिलक भी अति मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 5 ।।

उनका कार्य मधुर है, तैरना मधुर है, हरण मधुर है, रमण मधुर है,
 उद्धार मधुर है और शांति भी अति मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 6 ।।
उनकी गुंजा मधुर है, माला मधुर है, यमुना मधुर है, उसकी तरंगें मधुर हैं, 
उसका जल मधुर है और कमल भी मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 7 ।।
गोपियां मधुर हैं, उनकी लीला मधुर है, उनका संयोग मधुर है, वियोग मधुर है, 
निरीक्षण मधुर है और श‍िष्टाचार मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ।। 8 ।।

गोप मधुर हैं, गौएं मधुर हैं, लकुटी मधुर है, रचना मधुर है, दलन मधुर है
 और उसका फल भी अति मधुर है. श्रीमधुराधिपति का सभी कुछ मधुर है.

Rudrastdhyayi rudrabhishek

  ॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥ ॐ मङ्गलाचरणम् वन्दे सिद्धिप्रदं देवं गणेशं प्रियपालकम् । विश्वगर्भं च विघ्नेशं अनादिं मङ्गलं विभूम् ॥ अथ ध्यानम्...